लोकसभा के साथ ही हो सकते हैं 14 राज्यों के विधानसभा चुनाव

देश में अगले लोकसभा चुनाव के साथ-साथ राज्यों के विधानसभा चुनाव करवाने की तैयारी की जा रही है।

केंद्र सरकार बजट सत्र में इसको लेकर एक बिल संसद में ला सकती है। इस संबंध में नीति आयोग भी अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप चुका है जिसमें राज्यों के चुनाव 2 चरणों में लोकसभा चुनाव के साथ करवाने की सिफारिश की गई है। चुनाव आयोग ने भी कहा कि इस साल सितम्बर के बाद किसी भी वक्त वह राज्यों के विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ करवाने के लिए तैयार है। यदि यह बिल पास हो गया तो आने वाले लोकसभा चुनाव के साथ कम से कम 14 राज्यों के विधानसभा चुनाव भी हो जाएंगे। ‘  सरकार इस योजना पर काम क्यों कर रही है और इसका देश को क्या फायदा होगा।

 

क्या फायदे होंगे?

लगातार चुनाव के कारण रुकने वाले विकास के कार्य नहीं रुकेंगे।

बार-बार चुनाव पर होने वाला भारी-भरकम खर्च बचेगा।

सुरक्षा बलों की तैनाती पर होने वाले खर्च में कमी होगी।

चुनावी भ्रष्टाचार रुकेगा।

क्यों हो रहा है एक साथ चुनाव का फैसला?

2014 के चुनाव में 3870 करोड़ रुपए खर्च हुए थे, यह खर्च अगले चुनाव में 5000 करोड़ के पार जा सकता है।

विधानसभाओं के चुनाव हर छठे महीने होते हैं, इस फैसले के बाद चुनाव 30 महीने बाद होंगे।

1967 तक एक साथ होते थे चुनाव

1951 में पहले लोकसभा चुनाव के साथ 22 राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए थे और ये सिलसिला 1967 तक जारी रहा, लेकिन धीरे-धीरे लोकसभा की अवधि कम होने और कई राज्यों में सरकारों को बर्खास्त किए जाने या राष्ट्रपति शासन लागू होने और नए राज्यों के गठन के साथ ही विभिन्न राज्यों में चुनाव का समय बदलता गया जिस कारण आए साल देश के किसी न किसी राज्य में विधानसभा चुनाव होते हैं और केंद्र सरकार के अलावा चुनाव आयोग की पूरी मशीनरी हर साल चुनावी मोड में ही रहती है जिससे चुनाव वाले राज्यों में प्रशासनिक अधिकारी भी जनता के पूरे काम नहीं कर पाते। चुनाव आचार संहिता लागू होने के कारण विकास कार्यों पर भी प्रभाव पड़ता है।

संशोधित करनी पड़ सकती हैं संविधान की ये धाराएं

देश में लोकसभा चुनाव के साथ राज्यों के चुनाव करवाने के लिए कुछ कानूनी और संवैधानिक बदलाव करने की जरूरत पड़ेगी तथा ये बदलाव संसद द्वारा संविधान संशोधन के जरिए ही किए जा सकते हैं। संविधान की धारा 83 संसद (लोकसभा और राज्यसभा) की अवधि को परिभाषित करती है और इस धारा के तहत लोकसभा की अवधि 5 वर्ष निर्धारित की गई है। इसी प्रकार संविधान की धारा 172 (1) राज्यों के लिए 5 साल की अवधि का निर्धारण करती है। इसका मतलब है कि राज्यों की सरकारों की अवधि संविधान के मुताबिक नहीं बढ़ाई जा सकती जबकि एक साथ चुनाव करवाने के लिए राज्य विधानसभाओं की अवधि बढ़ानी पड़ सकती है।

संविधान की धारा 85 (20) (बी) देश के राष्ट्रपति को लोकसभा भंग करने की शक्ति प्रदान करती है। इसी तरह संविधान की धारा 174 (2) (बी) राज्यों के गवर्नर को राज्य विधानसभा भंग करने की शक्ति प्रदान करती है। यदि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हो तो यह शक्ति धारा 356 के तहत भी दी गई है लेकिन संविधान में कहीं भी आपातकाल को छोड़कर राज्य विधानसभाओं की अवधि बढ़ाने का प्रावधान नहीं है। इसके अलावा संविधान की धारा 324 चुनाव आयोग को देश में संवैधानिक प्रावधानों के तहत चुनाव करवाने की शक्तियां प्रदान करती है। ये चुनाव रिप्रैजैंटेशन ऑफ पीपल एक्ट 1951 के तहत करवाए जाते हैं। संविधान के मुताबिक चुनाव आयोग के पास लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा 6 महीने पहले करवाने का अधिकार है।

 

 

12 महीने लगी रहेगी चुनाव आचार संहिता

यदि राज्यों के विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ नहीं होते हैं तो देश के अलग-अलग राज्यों में चुनावी कारणों के चलते आचार संहिता लागू हो जाती है। सामान्य तौर पर चुनाव की घोषणा से लेकर अगली सरकार के गठन तक यह संहिता लागू रहती है और ऐसी स्थिति में राज्यों में केंद्र की योजनाएं तथा एम.पी. लैड फंड से होने वाला काम भी रुक जाता है। जनवरी, 2018 से लेकर दिसम्बर, 2019 के 24 महीनों में 16 राज्यों में विधानसभा के चुनाव लंबित हैं। इन राज्यों में कुल मिलाकर 6 बार आचार संहिता लगेगी जिससे करीब 12 महीने तक का काम ठप्प हो जाएगा। पिछली बार मार्च, 2014 से लेकर दिसम्बर, 2016 तक भी ऐसा ही हुआ था। 2014 में 7 महीने तक चुनाव आचार संहिता लागू रही थी जबकि 2015 में 3 महीने और 2016 में 2 महीने आचार संहिता लागू रही। ऐसी स्थिति में इन राज्यों में चुनाव आचार संहिता लागू रही तो एम.पी. लैड से होने वाला काम रुकने के अलावा सरकारी मशीनरी भी ठप्प होकर रह जाएगी जिसका जनता को नुक्सान होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *